मुरादाबाद: पीतल नगरी की कहानी, कारीगरी और जीआई टैग
मुरादाबाद को पीतल नगरी क्यों कहते हैं: पीतल के काम की शुरुआत, ढलाई, नक्काशी और पॉलिश के कारीगर, जीआई टैग का मतलब, और असली माल कैसे पहचानें।
सुबह की पहली चाय के साथ ही मुरादाबाद की गलियाँ बोलने लगती हैं। कहीं भट्ठी की धौंकनी चल रही है, कहीं रेती की खरखराहट है, और कहीं छेनी पर हथौड़ी की महीन ठक-ठक। एक कारखाने के आँगन में अभी-अभी ढली गणेश जी की मूर्तियाँ रेत झाड़कर कतार में रखी हैं, और बगल की दुकान में वही मूर्ति पॉलिश होकर चमक रही है। पीतल की मूर्ति कहाँ बनती है, इस सवाल का सबसे बड़ा जवाब यही शहर है।
मुरादाबाद कहाँ है और यहाँ क्या बनता है
मुरादाबाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रामगंगा नदी के किनारे बसा है। पूरा देश इसे पीतल नगरी के नाम से जानता है। यहाँ मूर्तियाँ, दीये, लोटे, कलश, थालियाँ, घंटियाँ, फूलदान और सजावट का सामान बनता है।
पीतल इस शहर की पहचान है, पर अकेली धातु नहीं। यहाँ के कारखाने एल्युमिनियम, तांबे, स्टील और पॉलिश चढ़े सामान पर भी काम करते हैं। वेदिकक्राफ्ट के कैटलॉग में 4,320 उत्पाद हैं, जिनमें 3,302 शुद्ध पीतल के हैं। बाकी दूसरी धातुओं के हैं, और हर उत्पाद के साथ धातु का नाम लिखा है।
पीतल नगरी कैसे बनी
यह शहर 17वीं सदी में मुगल काल में बसा। इसका नाम शहज़ादे मुराद बख़्श के नाम पर पड़ा। धातु का हुनर शहर के साथ ही पनपा और यहीं का होकर रह गया।
पीतल नगरी किसी एक दिन में नहीं बनी। हुनर बाप से बेटे को मिला, उस्ताद से शागिर्द को। धीरे-धीरे पूरे मोहल्ले एक-एक काम के लिए जाने जाने लगे। किसी गली में ढलाई होती है, किसी में नक्काशी, किसी में पॉलिश। यही बनावट आज भी इस शहर की ताक़त है।
कारीगर: साँचा, ढलाई, नक्काशी, पॉलिश
पीतल की मूर्ति कैसे बनाई जाती है, यह समझना हो तो उसे एक हाथ से दूसरे हाथ जाते देखिए। हर पड़ाव अपने आप में एक अलग हुनर है।
| काम | कारीगर क्या करता है | तैयार माल में क्या दिखता है |
|---|---|---|
| साँचा | दरज़े में नमूने के चारों ओर गीली रेत दबाकर साँचा बनाता है | आकार और अनुपात |
| ढलाई | भट्ठी में पीतल पिघलाकर साँचे में उँडेलता है | वज़न, दीवार की मोटाई, बिना गड्ढों की सतह |
| रेताई | फालतू धातु काटता है और जोड़ की लकीर रेती से घिसता है | बगल में जोड़ का निशान नहीं |
| नक्काशी | छेनी से बेल-बूटे उकेरता है, कुछ चीज़ों में रंग भरता है | साफ़ रेखाएँ, बराबर रंग |
| पॉलिश | बफ़ पर चमकाता है, ज़रूरत हो तो एंटीक रंगत या लैकर चढ़ाता है | चमक और रंगत |
रेत का साँचा एक ही बार काम आता है। चेहरे की आँखें, होंठ और उंगलियाँ रेत में पूरी नहीं उभरतीं। उन्हें कारीगर बाद में हाथ से निखारता है। एक ही नमूने से बनी दो मूर्तियों का फ़र्क़ यहीं से आता है।
जीआई टैग क्या है
जीआई यानी भौगोलिक संकेतक। यह उस चीज़ को मिलता है जिसकी ख़ासियत और साख किसी ख़ास जगह से जुड़ी हो, जैसे दार्जिलिंग की चाय या बनारसी साड़ी। ‘मुरादाबाद मेटल क्राफ्ट’ को भारत में जीआई टैग मिला है।
यह टैग नाम की हिफ़ाज़त करता है। पर टैग किसी एक चीज़ की जाँच नहीं करता। आपके हाथ की मूर्ति का वज़न कितना है, धातु कौन सी है, नक्काशी कैसी है, यह आपको ख़ुद देखना होता है।
विदेश के बाज़ार से घर के मंदिर तक
लंबे समय तक यहाँ का बहुत सा माल बाहर के ख़रीदारों के ऑर्डर पर बनता रहा: मोमबत्ती स्टैंड, गमले, ट्रे, मेज़ का सामान। साथ ही वही कारखाने घर की पूजा का सामान भी बनाते रहे, यानी मूर्ति, दीया, लोटा, थाली और घंटी।
ऑनलाइन बिक्री ने यह रास्ता छोटा कर दिया है। अब किसी भी शहर का परिवार थोक व्यापारी और दुकानदार की लंबी कड़ी के बिना सीधे मुरादाबाद से मँगा सकता है। वेदिकक्राफ्ट यही काम करता है। दिवाली के लिए लक्ष्मी गणेश की जोड़ी हो या साल भर के मंदिर के लिए पीतल की मूर्तियाँ, माल यहीं के कारखानों से निकलता है।
मुरादाबाद का पीतल ख़रीदते समय क्या देखें
- धातु पढ़ें। मुरादाबाद का हर सामान शुद्ध पीतल नहीं होता। लिस्टिंग में पीतल, एल्युमिनियम, तांबा या पॉलिश चढ़ा, साफ़ लिखा होना चाहिए।
- वज़न देखें। पीतल भारी धातु है। ऊँचाई के साथ ग्राम में वज़न मिलाइए। बड़ी मूर्ति बहुत हल्की हो तो वह खोखली, पतली या किसी और धातु की है।
- चुंबक लगाएँ। असली पीतल पर चुंबक नहीं चिपकता। चिपक जाए तो नीचे लोहा है। एल्युमिनियम पर भी नहीं चिपकता, इसलिए वज़न भी देखें।
- खरोंच के नीचे का रंग। तले की किसी छिपी जगह पर हल्की खरोंच लगाइए। पीतल अंदर तक पीला रहता है। परत चढ़े माल में नीचे धूसर धातु निकलती है।
- काम की बारीकी। चेहरे और उंगलियों को पास से देखिए। रेखाएँ साफ़ हों और बगल में जोड़ की लकीर न दिखे।
धनतेरस पर पीतल ख़रीदने की सोच रहे हों तो धनतेरस पर क्या खरीदें भी पढ़ लीजिए।







